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Tuesday, May 25, 2021

Vishnu Chalisa

Vishnu Chalisa
                                                                             


                                                                      ।दोहा।। 


विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥

।।चौपाई।।

नमो विष्णु भगवान खरारी,कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी,त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥1॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत,सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत,बैजन्ती माला मन मोहत ॥2॥

शंख चक्र कर गदा बिराजे,देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे,काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥3॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन,दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन,दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥4॥

पाप काट भव सिन्धु उतारण,कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण,केवल आप भक्ति के कारण ॥5॥

Vishnu Chalisa in Hindi

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा,तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा,रावण आदिक को संहारा ॥6॥

आप वाराह रूप बनाया,हरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया,चौदह रतनन को निकलाया ॥7॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया,रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया,असुरन को छवि से बहलाया ॥8॥

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया,मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया,भस्मासुर को रूप दिखाया ॥9॥

वेदन को जब असुर डुबाया,कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया,उसही कर से भस्म कराया ॥10॥

असुर जलन्धर अति बलदाई,शंकर से उन कीन्ह लडाई ।
हार पार शिव सकल बनाई,कीन सती से छल खल जाई ॥11॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी,बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी,वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥12॥

Vishnu Chalisa in Hindi

देखत तीन दनुज शैतानी,वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी,हना असुर उर शिव शैतानी ॥13॥

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे,हिरणाकुश आदिक खल मारे ।
गणिका और अजामिल तारे,बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥14॥

हरहु सकल संताप हमारे,कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे,दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥15॥

चहत आपका सेवक दर्शन,करहु दया अपनी मधुसूदन ।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन,होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥16॥

शीलदया सन्तोष सुलक्षण,विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।
करहुं आपका किस विधि पूजन,कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥17॥

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण,कौन भांति मैं करहु समर्पण ।
सुर मुनि करत सदा सेवकाईहर्षित रहत परम गति पाई ॥18॥

दीन दुखिन पर सदा सहाई,निज जन जान लेव अपनाई ।
पाप दोष संताप नशाओ,भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥19॥

सुत सम्पति दे सुख उपजाओ,निज चरनन का दास बनाओ ।
निगम सदा ये विनय सुनावै,पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥20॥

 

Thursday, October 1, 2020

Shiva Chalisa

 Shiva Chalisa

Shiva Chalisa

दोहा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।

कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान

 

चौपाई

जय गिरिजा पति दीन दयाला।

सदा करत सन्तन प्रतिपाला

 

भाल चन्द्रमा सोहत नीके।

कानन कुण्डल नागफनी के

 

अंग गौर शिर गंग बहाये।

मुण्डमाल तन क्षार लगाए

 

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।

छवि को देखि नाग मन मोहे 4

 

मैना मातु की हवे दुलारी।

बाम अंग सोहत छवि न्यारी

 

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।

करत सदा शत्रुन क्षयकारी

 

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।

सागर मध्य कमल हैं जैसे

 

कार्तिक श्याम और गणराऊ।

या छवि को कहि जात काऊ 8

 

देवन जबहीं जाय पुकारा।

तब ही दुख प्रभु आप निवारा

 

किया उपद्रव तारक भारी।

देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी

 

तुरत षडानन आप पठायउ।

लवनिमेष महँ मारि गिरायउ

 

आप जलंधर असुर संहारा।

सुयश तुम्हार विदित संसारा 12

 

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।

सबहिं कृपा कर लीन बचाई

 

किया तपहिं भागीरथ भारी।

पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी

 

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।

सेवक स्तुति करत सदाहीं

 

वेद माहि महिमा तुम गाई।

अकथ अनादि भेद नहिं पाई 16

 

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।

जरत सुरासुर भए विहाला

 

कीन्ही दया तहं करी सहाई।

नीलकण्ठ तब नाम कहाई

 

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।

जीत के लंक विभीषण दीन्हा

 

सहस कमल में हो रहे धारी।

कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी 20

 

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।

कमल नयन पूजन चहं सोई

 

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।

भए प्रसन्न दिए इच्छित वर

 

जय जय जय अनन्त अविनाशी।

करत कृपा सब के घटवासी

 

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।

भ्रमत रहौं मोहि चैन आवै 24

 

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।

येहि अवसर मोहि आन उबारो

 

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।

संकट ते मोहि आन उबारो

 

मात-पिता भ्राता सब होई।

संकट में पूछत नहिं कोई

 

स्वामी एक है आस तुम्हारी।

आय हरहु मम संकट भारी 28

 

धन निर्धन को देत सदा हीं।

जो कोई जांचे सो फल पाहीं

 

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी।

क्षमहु नाथ अब चूक हमारी

 

शंकर हो संकट के नाशन।

मंगल कारण विघ्न विनाशन

 

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।

शारद नारद शीश नवावैं 32

 

नमो नमो जय नमः शिवाय।

सुर ब्रह्मादिक पार पाय

 

जो यह पाठ करे मन लाई।

ता पर होत है शम्भु सहाई

 

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी।

पाठ करे सो पावन हारी

 

पुत्र होन कर इच्छा जोई।

निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई 36

 

पण्डित त्रयोदशी को लावे।

ध्यान पूर्वक होम करावे

 

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।

ताके तन नहीं रहै कलेशा

 

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।

शंकर सम्मुख पाठ सुनावे

 

जन्म जन्म के पाप नसावे।

अन्त धाम शिवपुर में पावे 40

 

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।

जानि सकल दुःख हरहु हमारी

 

दोहा

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।

तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश

मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।

अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण II

 

 

 


Saturday, September 26, 2020

Lakshmi Chalisa

 Lakshmi Chalisa

Lakshmi Chalisa










दोहा

 

मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास।

मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥

सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार।

ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ टेक॥

 

सोरठा

 

यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं।

सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

 

 

चौपाई

 

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥

तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥

 

जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥

तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी खासी॥

जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी।

 

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥

कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥

 

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥

क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥

 

चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥

तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥

 

अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥

तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहं तक महिमा कहौं बखानी॥

 

मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥

तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥

 

और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥

ताको कोई कष्ट होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥

त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥

जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥

 

ताको कोई रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।

पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥

 

विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी लावै॥

पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥

 

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥

बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥

प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोई जग में नाहिं॥

बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥

 

करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥

जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥

 

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूं नाहीं॥

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥

 

भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥

बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥

रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥

 

कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥

रामदास अब कहाई पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥

 

दोहा

 

त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास।

जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥

रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर।

मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥

।। इति लक्ष्मी चालीसा संपूर्णम।।


Vishnu Chalisa

                                                                                                                                            ...